अनेकार्थ के दोष का जाल

एक ही शब्द किसी तर्क के बीचोंबीच चुपचाप अपना अर्थ बदल सकता है, जिससे निष्कर्ष सुनने में एकदम पुख्ता लगता है, जबकि उसका अपने आधार-वाक्यों से कोई वास्तविक संबंध ही नहीं रहता।

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